फैटी लिवर की बीमारी दुनियाभर में उन लोगों को भी अपना शिकार बना रही है जो शराब नहीं पीते हैं। एक नई अध्ययन से विशेषज्ञों की टीम ने एक आम न्यूट्रिशन को फैटी लिवर बीमारी में काफी असरदार पाया है।
लाइफस्टाइल और खान-पान की गड़बड़ी ने शरीर के जिन अंगों को सबसे ज्यादा क्षति पहुंचाई है, लिवर उनमें से एक है। लिवर हमारे शरीर के लिए जरूरी अंग है। लिवर शरीर की विषाक्तता को निगलने के साथ मेटाबालिज्म को ठीक रखने और पोषक तत्वों के अवशोषण को बढ़ाने में मदद करता है। ऐसे में अगर इस अंग में कोई समस्या हो जाए तो पूरे शरीर पर इसका बुरा असर हो सकता है।
मेडिकल रिपोट्र्स से पता चलता है दुनियाभर में फैटी लिवर यानी लिवर में फैट बढ़ने के मामले बढ़ते जा रहे हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी को इसका शिकार पाया जा रहा है। लिवर को वैसे तो सबसे ज्यादा नुकसान शराब की वजह से होता है, पर फैटी लिवर का खतरा उन लोगों में भी ज्यादा देखा जा रहा है जो शराब नहीं पीते हैं। इसे नान अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिजीज (एनएएफएलडी) कहा जाता है।
भारत में हर 10 में से लगभग 3-4 लोगों को एनएएफएलडी हो सकता है । विशेषज्ञों ने इससे निजात पाने का एक असरदार तरीका ढूंढ लिया है। इसे समझने के लिए दक्षिण कोरिया के उल्सान नेशनल इंस्टीट्यूट आफ साइंस एंड टेक्नोलाजी के शोधकर्ताओं ने अध्ययन किया।
शोधकर्ताओं ने पाया कि माइक्रोआरएनए - 93 नाम का एक छोटा सा मालिक्यूल इस बीमारी में एक अहम भूमिका निभाता है। माइक्रोआरएनए छोटे मालिक्यूल होते हैं जो यह नियंत्रित करते हैं कि जीन कैसे काम करें ? फैटी लिवर की बीमारी से पीड़ित लोगों में माइक्रोआरएनए -93 का स्तर काफी ज्यादा पाया जाता है। विशेषज्ञों ने बताया कि इस समस्या के शिकार लोगों के लिए एक आम न्यूट्रिशन विटामिन बी3 फायदेमंद हो सकता है। मेटाबालिज्म जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन की रिपोर्ट में शोधकर्ताओं ने बताया कि आहार में अगर विटामिन बी3 वाली चीजों का मात्रा बढ़ा ली जाए तो इस समस्या से आराम पाया जा सकता है।
अध्ययन में पाया गया है कि माइक्रोआरएनए - 93 मुख्यरूप से एसआइआरटी 1 नाम के एक फायदेमंद जीन को रोककर लिवर की सेहत के लिए दिक्कतें बढ़ाता है। जब एसआइआरटी सही से काम नहीं कर पाता है, तो लिवर में फैट जमा होने लगता है। इससे सूजन, घाव और लिवर के काम करने की क्षमता में कमी आ जाती है। फैटी लिवर की समस्या को कम करने के लिए विज्ञानियों ने जीन एडिटिंग तकनीकों का इस्तेमाल करके चूहों में माइक्रोआरएनए - 93 का लेवल कम किया।
नतीजे काफी अच्छे रहे, समय के साथ चूहों के लिवर में फैट कम होता गया, इंसुलिन सेंसिटिविटी बेहतर हुई और लिवर की सेहत में सुधार आया। सबसे रोमांचक खोज तब सामने आई जब शोधकर्ताओं ने पहले से मौजूद 150 दवाओं का परीक्षण किया। उन्होंने पाया कि माइक्रोआरएनए - 93 का लेवल कम करने में विटामिन बी3 (नियासिन ) सबसे ज्यादा असरदार था। जिन चूहों को विटामिन बी-3 वाली चीजें या सप्लीमेंट्स दिए गए, उनमें नियासिन ने एसआइआरटी की गतिविधि को फिर से बेहतर किया और लिवर में फैट के मेटाबालिज्म को बेहतर बनाया।
विशेषज्ञों का मानना है कि फैटी लिवर वालों में विटामिन बी - 3 वाली डाइट या जरूरत होने पर सप्लीमेंट्स देना इलाज का एक नया और किफायती विकल्प हो सकता है। हालांकि, फैटी लिवर की बीमारी के इलाज में इसकी प्रभाविकता को साबित करने के लिए अभी और अधिक अध्ययन की जरूरत है।



